

समानता का अधिकार: जब किसान को उसकी उत्पादन लागत से कम मूल्य मिलता है, तो यह उसे अन्य वर्गों की तुलना में असमान स्थिति में डालता है।
जीवन और गरिमा का अधिकार: माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर यह स्पष्ट किया गया है कि जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी है। लागत से कम MSP किसान की आजीविका और गरिमा का उल्लंघन है।
बंधुआ/जबरन श्रम का निषेध: यदि किसान को उसकी लागत भी न मिले, तो यह आर्थिक रूप से बलात श्रम (Forced Labour) की श्रेणी में आता है।
1. स्वामीनाथन आयोग (National Commission on Farmers) ने स्पष्ट अनुशंसा की थी कि: MSP = C2 लागत + कम से कम 50% लाभ जबकि वर्तमान में अधिकांश फसलों में MSP, वास्तविक उत्पादन लागत के अनुरूप नहीं है।
2. केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न मंचों पर यह सार्वजनिक आश्वासन दिया गया है कि MSP किसानों को लाभकारी बनाया जाएगा, किंतु नीतिगत क्रियान्वयन का अभाव बना हुआ है।
MSP को केवल घोषणा मात्र तक सीमित रखना, बिना कानूनी गारंटी के, मनमाना (Arbitrary) और असंवैधानिक है।
उत्पादन लागत (बीज, खाद, कीटनाशक, श्रम, सिंचाई, ईंधन) लगातार बढ़ रही है, जबकि MSP में आनुपातिक वृद्धि नहीं की जा रही।
यह स्थिति नीति विफलता (Policy Failure) एवं राज्य के कल्याणकारी दायित्व के उल्लंघन को दर्शाती है।
1. MSP का निर्धारण वास्तविक उत्पादन लागत (C2 या कम से कम C1+FL) के आधार पर किया जाए।
2. निर्धारित उत्पादन लागत पर न्यूनतम 25% सुनिश्चित लाभ कानूनी रूप से जोड़ा जाए।
3. MSP को कानूनी अधिकार (Statutory Right) बनाया जाए, न कि केवल नीति-आधारित घोषणा।
4. MSP निर्धारण प्रक्रिया में किसान संगठनों की अनिवार्य भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
5. MSP के उल्लंघन पर दंडात्मक प्रावधान तय किए जाएँ।
संविधान के अनुच्छेद 32 एवं 226 के अंतर्गत माननीय सर्वोच्च न्यायालय / उच्च न्यायालय की शरण लेने,
एवं अन्य संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक उपाय अपनाने के लिए बाध्य होगी, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी संबंधित प्राधिकरण की होगी।
1. अनुच्छेद 19(1)(g) के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को कोई भी वैध व्यवसाय, व्यापार अथवा पेशा करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।
अनुच्छेद 21 (Article 21) –जीवन और गरिमा का अधिकार: माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर यह स्पष्ट किया गया है कि जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी है। लागत से कम MSP किसान की आजीविका और गरिमा का उल्लंघन है।
अनुच्छेद 23 (Article 23) –बंधुआ/जबरन श्रम का निषेध: यदि किसान को उसकी लागत भी न मिले, तो यह आर्थिक रूप से बलात श्र म(Forced Labour) की श्रेणी में आता है।
1. स्वामीनाथन आयोग (National Commission on Farmers) ने स्पष्ट अनुशंसा की थी कि: MSP = C2 लागत + कम से कम 50% लाभ जबकि वर्तमान में अधिकांश फसलों में MSP, वास्तविक उत्पादन लागत के अनुरूप नहीं है।
2. केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न मंचों पर यह सार्वजनिक आश्वासन दिया गया है कि MSP किसानों को लाभकारी बनाया जाएगा, किंतु नीतिगत क्रियान्वयन का अभाव बना हुआ है।
कानूनी प्रश्न (Legal Issues) MSP को केवल घोषणा मात्र तक सीमित रखना, बिना कानूनी गारंटी के, मनमाना (Arbitrary) और असंवैधानिक है। उत्पादन लागत (बीज, खाद, कीटनाशक, श्रम, सिंचाई, ईंधन) लगातार बढ़ रही है, जबकि MSP में आनुपातिक वृद्धि नहीं की जा रही। यह स्थिति नीति विफलता (Policy Failure) एवं राज्य के कल्याणकारी दायित्व के उल्लंघन को दर्शाती है।
1. MSP का निर्धारण वास्तविक उत्पादन लागत (C2 या कम से कम C1+FL) के आधार पर किया जाए।
2. निर्धारित उत्पादन लागत पर न्यूनतम 25% सुनिश्चित लाभ कानूनी रूप से जोड़ा जाए।
3. MSP को कानूनी अधिकार (Statutory Right) बनाया जाए, न कि केवल नीति-आधारित घोषणा।
4. MSP निर्धारण प्रक्रिया में किसान संगठनों की अनिवार्य भागीदारी
चेतावनी (Notice) यदि उपरोक्त मांगों पर उचित समयावधि में ठोस एवं विधिसम्मत निर्णय नहीं लिया जाता है, तो Kishan Majdur Ekta: संविधान के अनुच्छेद 32 एवं 226 के अंतर्गत माननीय सर्वोच्च न्यायालय / उच्च न्यायालय की शरण लेने, एवं अन्य संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक उपाय अपनाने के लिए बाध्य होगी, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी संबंधित प्राधिकरण की होगी।
निष्कर्ष किसान को लागत से कम मूल्य देना केवल आर्थिक अन्याय नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों का प्रत्यक्ष उल्लंघन है। MSP पर लाभ सुनिश्चित करना कोई अनुग्रह नहीं, बल्कि कानूनी और नैतिक दायित्व है।
किसानों द्वारा अपनी कृषि उपज मंडियों, सरकारी एजेंसियों, मिलों, क्रय केंद्रों एवं निजी खरीदारों को विक्रय किए जाने के उपरांत,
1. भारत का किसान लगातार अनिश्चित मौसम, बढ़ती उत्पादन लागत, कम MSP, और बाज़ार अस्थिरता से जूझ रहा है।
2. इन परिस्थितियों में किसान को फसल उत्पादन हेतु बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों से फसली ऋण लेना पड़ता है।
3. परंतु जब फसल का उचित मूल्य नहीं मिलता या प्राकृतिक आपदा आती है, तो किसान ऋण चुकाने में असमर्थ हो जाता है।
4. इसके परिणामस्वरूप किसान पर ब्याज का बोझ, रिकवरी नोटिस, कानूनी कार्यवाही, और मानसिक उत्पीड़न बढ़ता है।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार प्रदान करता है। अत्यधिक कर्ज़, ब्याज और वसूली के दबाव में जी रहा किसान सम्मानपूर्वक जीवन नहीं जी पा रहा, जो अनुच्छेद 21 का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
जब अन्य क्षेत्रों में सेवाओं/उत्पादों के विलंबित भुगतान पर ब्याज का प्रावधान है,
राष्ट्रीय संसाधनों का वितरण सार्वजनिक हित में हो
आर्थिक व्यवस्था से शोषण न हो, ब्याज आधारित फसली ऋण प्रणाली किसान के आर्थिक शोषण को जन्म देती है।
हालाँकि ये न्यायालय में सीधे लागू नहीं, परंतु सरकार के लिए नैतिक व संवैधानिक रूप से बाध्यकारी हैं। कृषि को सहायता देना राज्य का संवैधानिक दायित्व है, कोई अनुदान नहीं।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्णयों में कहा है कि: “राज्य की नीतियाँ यदि नागरिक के जीवन, आजीविका और गरिमा को प्रभावित करती हैं, तो राज्य का दायित्व है कि वह सुधारात्मक कदम उठाए।” किसानों की आत्महत्या, ऋण-दबाव और भूमि नीलामी राज्य की नीतिगत विफलता को दर्शाती है।
उपरोक्त तथ्यों व संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर हम भारत सरकार से निम्नलिखित कानूनी मांगें करते हैं:
सभी छोटे, सीमांत एवं मध्यम किसानों के समस्त फसली ऋण तत्काल प्रभाव से माफ किए जाएं
बकाया ब्याज, दंडात्मक ब्याज और वसूली प्रक्रिया समाप्त की जाए
भविष्य में किसानों को दिया जाने वाला फसली ऋण पूर्णतः ब्याज-मुक्त हो
ऋण की शर्तें सरल, पारदर्शी और किसान-अनुकूल हों
ऋण न चुका पाने के कारण किसी भी किसान के विरुद्ध रिकवरी, नीलामी या आपराधिक कार्यवाही न की जाए
यदि उपरोक्त मांगों पर उचित समयावधि के भीतर ठोस कार्रवाई नहीं की जाती, तो Kishan Majdur Ekta निम्न विधिक उपाय अपनाने के लिए बाध्य होगी:
अन्य संवैधानिक व विधिक मंचों पर किसानों के मौलिक अधिकारों की रक्षा हेतु कार्रवाई करना।
मनमाने दाम वसूले जाते हैं
नकली एवं घटिया सामग्री बेची जाती है
किसानों को ऊँचे ब्याज पर उधार लेने को मजबूर किया जाता है
कृषि लागत असहनीय रूप से बढ़ जाती है
कानूनी एवं संवैधानिक आधार (LEGAL GROUNDS)
भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार प्रदान करता है। महँगी व शोषणकारी कृषि सामग्री किसानों के जीवन और आजीविका पर सीधा आघात है।
आर्थिक असमानता कम करे
आजीविका के साधनों का समान वितरण सुनिश्चित करे
4. कृषि (Development & Regulation) से जुड़े कानून
कृषि उत्पादन की लागत नियंत्रित करे
किसानों को शोषण से बचाए
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से आवश्यक इनपुट उपलब्ध कराए
1 प्रत्येक ज़िले एवं ब्लॉक स्तर पर सरकारी खाद, बीज एवं कृषि दवाइयों की दुकानें स्थापित की जाएँ।
2 इन दुकानों के माध्यम से 100% प्रमाणित, गुणवत्तापूर्ण एवं नकली-मुक्त सामग्री उपलब्ध कराई जाए।
3 किसानों को खाद, बीज एवं दवाइयों की ब्याजमुक्त आपूर्ति (Interest-Free Supply) सुनिश्चित की जाए, ताकि उन्हें साहूकारों पर निर्भर न रहना पड़े।
4 इन दुकानों को निजी मुनाफ़ाखोरी से पूर्णतः मुक्त रखा जाए तथा पारदर्शी मूल्य प्रणाली लागू हो।
5 यदि उपरोक्त मांगों की अनदेखी होती है, तो यह किसानों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा।
माननीय न्यायालय की शरण
जनहित याचिका (PIL)
संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक आंदोलन
अतः, हम आशा करते हैं कि भारत सरकार किसानों की दुर्दशा को समझते हुए इस कानूनी एवं न्यायोचित मांग पर शीघ्र सकारात्मक निर्णय लेगी।
1. अनुच्छेद 21 – जीवन का अधिकार (Right to Life): माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह स्थापित है कि जीवन का अधिकार केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्मानजनक आजीविका (Right to Livelihood) भी इसका अभिन्न अंग है। फसल नष्ट होने पर पर्याप्त बीमा न होना, किसानों के अनुच्छेद 21 का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
2. अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार (Right to Equality): विभिन्न क्षेत्रों/राज्यों में किसानों को मिलने वाली बीमा राशि में भारी असमानता मनमानी एवं भेदभावपूर्ण है, जो अनुच्छेद 14 के विरुद्ध है।
3. अनुच्छेद 38 एवं 39 (नीति निदेशक तत्व): राज्य का दायित्व है कि वह आर्थिक न्याय, आजीविका के पर्याप्त साधन तथा सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करे। अपर्याप्त फसल बीमा इन दायित्वों के विपरीत है।
4. राज्य की सकारात्मक जिम्मेदारी (Positive Obligation of State): जब कृषि को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना गया है, तब किसानों को प्राकृतिक आपदाओं से वित्तीय सुरक्षा प्रदान करना राज्य का अनिवार्य कर्तव्य है।
मौजूदा फसल बीमा योजनाओं में
वास्तविक नुकसान की भरपाई नहीं होती,
भुगतान में अत्यधिक विलंब होता है,
बीमा राशि किसान की वास्तविक लागत, आय और जोखिम के अनुपात में अत्यंत अपर्याप्त है।
उपरोक्त तथ्यों एवं संवैधानिक प्रावधानों के आलोक में, Kishan Majdur Ekta भारत सरकार से यह औपचारिक एवं कानूनी मांग करती है कि:
1. प्रत्येक किसान एवं उसकी फसल के लिए ₹10,00,000 (दस लाख रुपये) प्रति बीघा का सरकार–प्रायोजित, अनिवार्य एवं पूर्ण बीमा सुनिश्चित किया जाए।
2. बीमा कवरेज में निम्नलिखित सभी जोखिम शामिल हों:
a. प्राकृतिक आपदाएं (सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि, अतिवृष्टि)
b. कीट एवं रोग प्रकोप o जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न क्षति
3. क्षति के 60 दिनों के भीतर बीमा राशि का प्रत्यक्ष भुगतान किसान के खाते में किया जाए।
4. बीमा प्रीमियम का पूर्ण वहन केंद्र/राज्य सरकार द्वारा किया जाए, ताकि किसान पर कोई अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े।
यदि उपरोक्त मांगों पर उचित समयावधि में सकारात्मक कार्यवाही नहीं की जाती है, तो Kishan Majdur Ekta संविधान के अनुच्छेद 226/32 के अंतर्गत माननीय उच्च न्यायालय/सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने तथा अन्य वैधानिक उपाय अपनाने के लिए बाध्य होगी, जिसकी समस्त जिम्मेदारी संबंधित प्राधिकरणों की होगी।
4. कृषि (Development & Regulation) से जुड़े कानून
कृषि उत्पादन की लागत नियंत्रित करे
किसानों को शोषण से बचाए
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से आवश्यक इनपुट उपलब्ध कराए
1 प्रत्येक ज़िले एवं ब्लॉक स्तर पर सरकारी खाद, बीज एवं कृषि दवाइयों की दुकानें स्थापित की जाएँ।
2 इन दुकानों के माध्यम से 100% प्रमाणित, गुणवत्तापूर्ण एवं नकली-मुक्त सामग्री उपलब्ध कराई जाए।
3 किसानों को खाद, बीज एवं दवाइयों की ब्याजमुक्त आपूर्ति (Interest-Free Supply) सुनिश्चित की जाए, ताकि उन्हें साहूकारों पर निर्भर न रहना पड़े।
4 इन दुकानों को निजी मुनाफ़ाखोरी से पूर्णतः मुक्त रखा जाए तथा पारदर्शी मूल्य प्रणाली लागू हो।
5 यदि उपरोक्त मांगों की अनदेखी होती है, तो यह किसानों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा।
माननीय न्यायालय की शरण
जनहित याचिका (PIL)
संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक आंदोलन
अतः, हम आशा करते हैं कि भारत सरकार किसानों की दुर्दशा को समझते हुए इस कानूनी एवं न्यायोचित मांग पर शीघ्र सकारात्मक निर्णय लेगी।
1. किसानों द्वारा खरीदे गए कृषि संसाधनों पर कोई केंद्रीय कर/राज्य कर नहीं लगना चाहिए। कृषि संसाधनों के ऊपर कर लगाने से किसानों की आर्थिक स्थिति में और अधिक दबाव बढ़ता है। इससे किसानों की प्रेरणा कम होती है और वे उत्पादन में भी निवेश करने में हिचकिचाते हैं।
2. किसानों को कृषि संसाधनों के खरीद पर लगने वाले करों से मुक्त करना उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत करेगा। यह उन्हें उत्पादन में अधिक रुचि और उत्साह प्रदान करेगा। इससे कृषि उत्पादन में वृद्धि होगी और किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा।
3. इसके अलावा, कृषि संसाधनों पर कर लगाने से उत्पादक मूल्य में वृद्धि होगी और खाद्य सामग्रियों की कीमतें भी बढ़ेंगी। यह आम जनता को भी प्रभावित करेगा। इसलिए, किसानों द्वारा खरीदे गए कृषि संसाधनों पर कोई केंद्रीय कर/राज्य कर नहीं लगना चाहिए ताकि किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके और वे अपने काम में अधिक प्रेरित हों।
1. खेतों में ट्यूबवेल के लिए दिया जाने वाला बिजली बिल पूरी तरह माफ किया जाना चाहिए। कृषि व्यवसाय को समृद्धि और उत्थान के लिए सही बिजली की उपलब्धता की आवश्यकता होती है, और यह प्रस्ताव किसानों को इस दिशा में प्रोत्साहित करेगा।
2. खेती के लिए ट्यूबवेल एक महत्वपूर्ण साधन है, जो किसानों को पानी की आपूर्ति में सुधार करने में मदद करता है। लेकिन ट्यूबवेलों को चलाने के लिए बिजली की आवश्यकता होती है, जिसका बिल किसानों को भुगतना पड़ता है। इसके अलावा, कई बार विभिन्न कारणों से ट्यूबवेलों के चलने के लिए बिजली की उपलब्धता में कठिनाईयां भी आती हैं, जो किसानों को अधिक आर्थिक दबाव में डालती हैं।
3. इस प्रस्ताव के अनुसार, खेतों में ट्यूबवेल के लिए दी जाने वाली बिजली का बिल पूरी तरह माफ किया जाना चाहिए। यह किसानों को आर्थिक दबाव से राहत देगा और उन्हें पानी की आपूर्ति में सुधार करने के लिए प्रोत्साहित करेगा। इसके अलावा, यह किसानों को अधिक उत्पादन की दिशा में भी प्रेरित करेगा, जो कि उनकी आर्थिक स्थिति को सुधारेगा।
4. इस प्रस्ताव के अनुसार, किसानों को बिजली के बिल का पर्याप्त ध्यान नहीं देना पड़ेगा, जिससे उन्हें अपनी खेती में अधिक उत्साह मिलेगा और वे अपने कृषि उत्पादन को समृद्ध बना सकेंगे।
1. किसानों और उनकी फसलों की सुरक्षा के लिए बीमा का महत्वपूर्ण एक्सेस है, और इसके लिए बीमा प्रणाली को मजबूत करना आवश्यक है। किसानों की आर्थिक सुरक्षा और उनके उत्पादन की सुरक्षा के लिए, किसानों और उनकी फसलों का कम से कम 10 लाख रुपये प्रति बीघे की दर से बीमा होना चाहिए।
2. बीमा के माध्यम से, किसान अपनी फसलों को विपरीत परिस्थितियों से सुरक्षित रख सकते हैं। अन्यथा, प्राकृतिक आपदाओं, वायुगत आपदाओं, और अन्य अनियांत्रित परिस्थितियों में होने वाले नुकसानों के मामले में, किसानों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो सकती है।
3. साथ ही, बीमा किश्तों को सरकार द्वारा भुगतान की जाने चाहिए। ऐसा करने से, किसानों को बीमा की लागत का बोझ नहीं उठाना पड़ेगा और वे अपने उत्पादन पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और उनका विश्वास बढ़ेगा कि उनकी सरकार उनके साथ है और उनकी मदद करेगी।
4. सार्वजनिक बीमा कार्यक्रमों के माध्यम से, सरकार किसानों को बीमा सुविधा प्रदान कर सकती है, जिससे किसानों की सुरक्षा में सुधार होगा और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। इसके अलावा, सरकार बीमा प्रीमियम का हिस्सा या पूरा भुगतान करके किसानों को साथ खड़े होने का संदेश देगी कि वह उनके हर कदम पर है और उनकी सहायता के लिए तत्पर है।
5 इस प्रकार, किसानों और उनकी फसलों के लिए बीमा का प्रावधान महत्वपूर्ण है। इससे किसानों की सुरक्षा बढ़ेगी और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होगा।
1. कृषि भूमि से संबंधित मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक अदालतों में की जानी चाहिए भले ही मामला सरकार के खिलाफ हो। मामले में फैसले की अधिकतम समय सीमा केस दर्ज होने के 60 दिन के भीतर होनी चाहिए।
2. कृषि भूमि से संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों की स्थापना एक महत्वपूर्ण कदम होगा। कृषि सम्बंधित मामलों की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए, इन अदालतों का गठन किया जाएगा ताकि तत्काल और न्यायपूर्ण निर्णय दिया जा सके।
3. फास्ट ट्रैक अदालतों की स्थापना का मुख्य उद्देश्य है कि कृषि भूमि से संबंधित मामलों को तत्काल सुनवाई और फैसले करने का प्रदान किया जा सके। इससे न केवल किसानों को न्याय मिलेगा, बल्कि समाज को भी विश्वास का प्रसाद मिलेगा।
4. मामलों में फैसले की समय सीमा को 60 दिन के भीतर रखना जरूरी है। ऐसा करके, न्यायिक प्रक्रिया को तेज़ किया जा सकता है और लंबित न्यायिक मामलों के संख्या को कम किया जा सकता है। इससे कृषि सम्बंधित मामलों के लिए न्यायिक दिलाए जाने वाले निर्णय का आदान-प्रदान तेज होगा और किसानों को न्याय मिलेगा।
5. फास्ट ट्रैक अदालतों के माध्यम से, सरकार की विभिन्न कदमों या नीतियों के खिलाफ मामलों की सुनवाई भी तेजी से हो सकेगी। यदि किसानों के हित में कोई अन्याय होता है, तो उनके मामलों को भी तत्काल और न्यायपूर्ण तरीके से सुलझाया जा सकेगा।
6. इस प्रकार, कृषि भूमि से संबंधित मामलों की तत्काल सुनवाई और न्यायपूर्ण निर्णय के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों की स्थापना की जानी चाहिए। यह किसानों के हित में होगा और उन्हें न्याय मिलेगा, जिससे समाज में भरोसा बढ़ेगा और कृषि सेक्टर को भी विश्वास मिलेगा।
1. किसानों के लिए 5000 रुपये प्रति माह की पेंशन योजना की लागूकरण की जरूरत है, जिसमें कोई आयु सीमा न हो। भारतीय कृषि समाज का आधार हैं किसान, और उनके योगदान को समझते हुए उन्हें आर्थिक सहारा प्रदान करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
2. कृषि क्षेत्र में काम करने वाले किसान अक्सर आर्थिक संकटों का सामना करते हैं। उनकी आय अनियमित होती है और कई बार वे परिवार के लिए आर्थिक संभावनाओं में संकट से गुजरना पड़ता है। इसलिए, ऐसे किसानों के लिए पेंशन योजना की आवश्यकता है जो उन्हें आर्थिक सुरक्षा प्रदान करे और उनके जीवन को स्थिरता दे।
3. इस योजना के माध्यम से, किसानों को हर माह 5000 रुपये की पेंशन प्राप्त होगी। यह राशि उनके आर्थिक बुनियाद को मजबूत करेगी और उन्हें उनकी आजीविका के लिए आवश्यक सहायता प्रदान करेगी। इसके अलावा, इस योजना के तहत किसानों को किसी भी आयु में इसका लाभ प्राप्त करने का अधिकार होगा।
4. यह पेंशन योजना किसानों के जीवन में आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए महत्वपूर्ण योजना है। इससे किसानों की सामाजिक सुरक्षा में सुधार होगा और वे अपने आगे के जीवन की योजना बनाने में सक्षम होंगे।
5. इस योजना का लागूकरण किसानों को सामूहिक रूप से आर्थिक सुरक्षा प्रदान करेगा। इससे किसानों की आत्मनिर्भरता में सहायता मिलेगी और उन्हें उनके बुद्धिमानी और योग्यता के अनुसार उनके खुद के निर्णय लेने का अधिकार मिलेगा।
6. अंत में, किसानों के लिए 5000 रुपये प्रति माह की पेंशन योजना की लागूकरण से वे आर्थिक सुरक्षित होंगे और उनका जीवन स्थिर और सुखमय होगा। इससे कृषि समाज की स्थिति में सुधार होगी और वे अपने काम में अधिक उत्साहित होंगे।
1. 60 वर्ष की आयु के बाद, किसानों को वानप्रस्थ कार्ड प्राप्त करना चाहिए, जिसकी मदद से वे देश में कहीं भी प्रथम श्रेणी में मुफ्त यात्रा कर सकते हैं। वानप्रस्थ कार्ड का उद्देश्य किसानों को उनके अवसान यात्रा की अनुभूति में सुविधा प्रदान करना है।
2. बहुत से किसान अपने जीवन भर कृषि के क्षेत्र में मेहनत करते हैं, और उन्हें अपने बाद यात्रा करने का समय और संसाधन नहीं मिलता। वानप्रस्थ कार्ड के माध्यम से, उन्हें अपनी इच्छित यात्राओं का आनंद लेने का मौका मिलेगा, जिससे उनका जीवन संतुलित और सुखमय होगा।
3. वानप्रस्थ कार्ड के लिए किसानों की आयु सीमा 60 वर्ष होनी चाहिए, क्योंकि इस उम्र में वे अपने काम को समाप्त करते हैं और अपने जीवन का अगला चरण शुरू करते हैं। इस उम्र में, उन्हें अपने परिवार और समाज के साथ समय बिताने का अधिक इच्छा होता है।
4. वानप्रस्थ कार्ड के धारावाहिक आर्थिक लाभ के साथ-साथ, इससे किसानों को समाज में अपना मान बनाए रखने का भी अवसर मिलेगा। इस योजना से, हम समाज के उन लोगों को सम्मानित करेंगे जिन्होंने अपने पूरे जीवन में कृषि के क्षेत्र में काम किया है।
5. इस प्रकार, वानप्रस्थ कार्ड की योजना से, किसानों को उनके उत्तीर्ण जीवन की यात्रा को आसान और सुखद बनाने का अवसर मिलेगा। इससे किसानों का सम्मान और समाज में उनकी आजीविका के प्रति समझ बढ़ेगी।
1. किसानों को अपनी बेटियों की शादी के लिए कम से कम 5 लाख रुपये का ब्याज मुक्त ऋण मिलना चाहिए। यह एक महत्वपूर्ण योजना है जो किसान समुदाय की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को सुधारने में मदद करेगी।
2. किसान समाज में बेटियों की शादी एक महत्वपूर्ण घटना होती है, लेकिन कई बार यह आर्थिक दबाव बन जाता है। शादी के खर्चों को ध्यान में रखते हुए, कई किसान अपनी बेटियों की शादी के लिए ऋण लेने के मजबूर हो जाते हैं, जिसमें ब्याज की भरपाई की गई होती है। ऐसे मामलों में, ऋण लेने वाले किसानों की आर्थिक स्थिति और उनका ब्याज भुगतान करने का दबाव बढ़ जाता है।
3. इस तरह की समस्याओं को दूर करने के लिए, किसानों को बेटियों की शादी के लिए ब्याज मुक्त ऋण की सुविधा प्रदान की जानी चाहिए। इस योजना के तहत, किसानों को 5 लाख रुपये तक का ऋण मिलेगा, जिसमें किसी भी प्रकार का ब्याज नहीं होगा। इससे किसानों को आर्थिक दबाव से छुटकारा मिलेगा और वे अपनी बेटियों की शादी के खर्चों को सम्भालने में सहायता प्राप्त कर सकेंगे।
4. इस योजना के माध्यम से, समाज में बेटियों के विवाह को समर्थन दिया जाएगा और किसानों को उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा का आदान-प्रदान किया जाएगा। इससे किसान समाज में एक सकारात्मक परिवर्तन आएगा और उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार होगी।
5. इस योजना के माध्यम से, किसानों को ऋण के लिए अधिक ब्याज भुगतान की चिंता नहीं करनी पड़ेगी, और वे अपने बेटियों की शादी के लिए आराम से विचार सकेंगे। इससे किसान समाज में न्यूनतम आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा और उनका सामाजिक स्थिति में समानता की दिशा में प्रगति होगी।
डॉ। स्वामी नाथन, एक प्रमुख स्वास्थ्य चिकित्सक और स्वास्थ्य परामर्शक हैं, जिनका उद्देश्य लोगों को स्वस्थ जीवनशैली की दिशा में मार्गदर्शन करना है। उनका विशेषज्ञता क्षेत्र स्वास्थ्य और रोग प्रबंधन, जीवनशैली परिवर्तन और आहार विज्ञान में है। उनका दीर्घकालिक अनुभव और संवेदनशीलता लोगों को होलिस्टिक स्वास्थ्य देखने का आदान-प्रदान करते हैं। उनकी वेबसाइट एक साधारित स्वास्थ्य जीवनशैली, रोग प्रबंधन और पूर्णता की दिशा में साकारात्मक सूचना और सुझावों से भरी है। डॉ। स्वामी नाथन का अनुभव और विशेषज्ञता लोगों को स्वस्थ और खुश जीवन की दिशा में मदद करने में आगे बढ़ने में सहायक हैं।
                      डॉ। स्वामी नाथन ने किसानों के साथ मिलकर मौद्रिक स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए नीतियों का समर्थन किया है।
                      उन्होंने किसानों को नई तकनीक और कृषि में नवाचार को अपनाने के लिए प्रेरित किया है, जो उनकी उत्पादकता बढ़ाने में मदद कर सकता है।
                      किसानों को उच्च मूल्य नहीं मिलने पर उनकी समस्याओं का समर्थन करने के लिए, उन्होंने सरकार से न्यूनतम समर्थन मूल्यों को बढ़ाने की मांग की है।
                      डॉ। स्वामी नाथन ने किसानों के ऊपर बोझिल ऋणों का समर्थन करने के लिए नीतियों को बनाया है ताकि वे आराम से अपनी किसानी चला सकें।
                      उन्होंने किसानों को नई तकनीकों और स्थानीय उत्पादों के लिए शिक्षा प्रदान करने के लिए कई प्रोग्रामों की शुरुआत की है।
किसानों को अनादिकृत बीज और उचित उपकरण की कमी से भी गुज़रना पड़ता है। ये उनके उत्थान को प्रभावित करता है और उनकी उन्नति को रोकता है। सरकार को किसानों को आधुनिक कृषि तकनीक से रूबरू कराना चाहिए और उन्हें उचित बीज और उपकरण प्रदान करना जरूरी है।
सरकार से प्राथमिक रूप से प्रमुख माध्यम है आधुनिक कृषि यंत्र प्रदान करना। किसानों को उचित बीज और आधुनिक खेती तकनीकों से रूबरू कराने के लिए, सरकार को किसानों को सुखद उपकरण प्रदान करने का प्रयास करना चाहिए।
सरकार को किसानों के लिए आधुनिक बीमा योजना का विकास करना चाहिए, जिससे वे प्राकृतिक आपदाएं या अन्य नुक्सान से बच सकें। इसके लिए, सरकार को बीमा योजनाओं की गहनताओं में सुधार करना होगा और किसानों को इसके लाभ का पूर्ण रूप से अनुभव करने के लिए जागरूक करना होगा।
किसानों के ऊपर अधिक कर्ज होने के कारण, उनका मनोबल गिर जाता है। सरकार को किसानों को कर्ज मुक्त करने का प्रयास करना चाहिए, ताकि वे अपनी खेती को बिना किसी दबाव के सफलता से चला सकें। इसके लिए, सरकार को किसानों को सस्ता कर्ज देना चाहिए और उन्हें कर्ज मुक्ति के लिए योजनाओं को बढ़ावा देना चाहिए।
व्यवस्था में सुधार करके, सरकार किसानों को उनके उत्थान के लिए उच्च दाम प्रदान कर सकती है। आधुनिक तकनीक और व्यवसायी मूल्यों के आधार पर, सरकार को किसानों को बेहतर मंडी व्यवस्था प्रदान करने का प्रयास करना चाहिए।
किसानों को भी सरकार का समर्थन करना चाहिए। वे अपने हकों के प्रति जागरूक रहें और अपने क्षेत्र के विकास में सरकार से मेल-जोल बनाएं रखने का प्रयास करें। किसानों का एक मजबूत संगठन भी सरकार के साथ मिलकर अपनी समस्याओं का समाधान निकालने में मदद करेगा।
सरकार को किसानों के साथ एक नियम और खुला संपर्क बनाना चाहिए। इसे, सरकार किसानों के मनोबल को सुधार सकती है और उनकी समस्याओं का समाधान निकल सकती है।
सरकार को किसानों को उनके अधिकार और सरकारी योजनाओं के बारे में अधिक जागरूक बनाना चाहिए। योजनाओं का सही ढंग से प्रचार करके, किसानों को उनके लाभ का पूर्ण रूप से अनुभव करने में मदद मिल सकती है।
पद्म पुरस्कार भारत सरकार द्वारा प्रतिवर्ष दिया जाने वाला उच्चतम सिविल सम्मान है। इसे 1954 में स्थापित किया गया था। पुरस्कार विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्टता दिखाने वाले व्यक्तियों को सम्मानित करने के लिए प्रदान किया जाता है, जैसे कला, विज्ञान, साहित्य, सामाजिक सेवा, खेल, और यातायात। यह विभिन्न पद्म विभूषण, पद्म भूषण, और पद्मश्री से मिलकर बना होता है, जिनमें विभिन्न श्रेणियां शामिल हैं।
श्री. तुला राम उप्रेती सिक्किम से हैं। वह 98 वर्ष के हैं और उनका एक विशाल संयुक्त परिवार है जिसमें 8 बेटे और 7 बेटियां, 104 पोते-पोतियां और परपोते-पोतियां शामिल हैं। उनकी 5वीं कक्षा तक की शिक्षा तासी नामग्याल हायर सेकेंडरी स्कूल (अब टीएन सीनियर सेकेंडरी स्कूल) में हुई। उन्होंने 25 वर्षों के कार्यकाल के लिए असम लिंग्ज़ी ग्राम पंचायत इकाई के अंतर्गत लिंग्ज़ी वार्ड से एक स्थानीय पंचायत के लिए काम किया है। वह दो बार पंचायत अध्यक्ष रह चुके थे। उनके बेटे केएन उप्रेती 1979-99 तक रेनॉक निर्वाचन क्षेत्र से पूर्व मंत्री और विधायक रहे हैं। उन्हें जैविक खेती पुरस्कार 2023 के लिए सम्मानित किया गया।

चेरुवायल रमन 75 वर्षीय धान किसान हैं जो केरल के वायनाड जिले में रहते हैं। वह कुराचिया के आदिवासी समुदाय से हैं। गांव वाले उसे प्यार से रामेत्तन कहते हैं। जब वह केवल 10 वर्ष के थे तब उन्होंने खेतों में काम करना शुरू कर दिया था। 1969 में अपने चाचा की मृत्यु के बाद उन्होंने धान की खेती को गंभीरता से लिया। उन्होंने अपने चाचा द्वारा छोड़ी गई 40 एकड़ जमीन पर चावल उगाना शुरू किया। उन्होंने 2000 के दशक की शुरुआत में स्वदेशी धान के बीजों को संरक्षित करना शुरू किया।

नेकराम शर्मा 59 वर्षीय किसान हैं। वह हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की करसोग घाटी में रहते हैं। 1984 में जब वे युवा थे, तब उन्हें सरकारी नौकरी के लिए अस्वीकार कर दिया गया था। ठुकराए जाने के बाद उन्होंने अपने परिवार की 22 बीघे अनुपयोगी जमीन पर खेती शुरू कर दी। उनके द्वारा फल और सब्जियाँ उगाई जाती थीं। प्रयोग के तौर पर उन्होंने जैविक खेती का प्रयास किया। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग के बिना फसलों की खेती का पूरा ज्ञान प्राप्त करने के बाद, उन्होंने पूरी तरह से प्राचीन कृषि तकनीकों की ओर रुख किया। उनके इस कदम ने उन्हें 2023 पद्मी श्री पुरस्कार का विजेता बना दिया।

पतायत साहू 65 वर्षीय व्यक्ति हैं जो ओडिशा के कालाहांडी जिले के नंदोल गांव में रहते हैं। उनके दादा एक वैद्य (पारंपरिक चिकित्सक) थे। इससे उन्हें औषधीय पौधों में रुचि हो गई और अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अपने दादा से उपचार पद्धतियां सीखीं। उन्होंने पारंपरिक उपचार विधियों और औषधीय पौधों और उनके उपयोग पर विभिन्न पांडुलिपियां पढ़ीं। शुरुआत में औषधीय पौधों के बारे में सीखना उनका शौक था लेकिन बाद में उन्होंने 40 साल पहले एक औषधीय उद्यान उगाना शुरू किया और समय के साथ इसमें नई प्रजातियाँ जोड़ीं।
