

समानता का अधिकार: जब किसान को उसकी उत्पादन लागत से कम मूल्य मिलता है, तो यह उसे अन्य वर्गों की तुलना में असमान स्थिति में डालता है।
जीवन और गरिमा का अधिकार: माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर यह स्पष्ट किया गया है कि जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी है। लागत से कम MSP किसान की आजीविका और गरिमा का उल्लंघन है।
बंधुआ/जबरन श्रम का निषेध: यदि किसान को उसकी लागत भी न मिले, तो यह आर्थिक रूप से बलात श्रम (Forced Labour) की श्रेणी में आता है।
1. स्वामीनाथन आयोग (National Commission on Farmers) ने स्पष्ट अनुशंसा की थी कि: MSP = C2 लागत + कम से कम 50% लाभ जबकि वर्तमान में अधिकांश फसलों में MSP, वास्तविक उत्पादन लागत के अनुरूप नहीं है।
2. केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न मंचों पर यह सार्वजनिक आश्वासन दिया गया है कि MSP किसानों को लाभकारी बनाया जाएगा, किंतु नीतिगत क्रियान्वयन का अभाव बना हुआ है।
MSP को केवल घोषणा मात्र तक सीमित रखना, बिना कानूनी गारंटी के, मनमाना (Arbitrary) और असंवैधानिक है।
उत्पादन लागत (बीज, खाद, कीटनाशक, श्रम, सिंचाई, ईंधन) लगातार बढ़ रही है, जबकि MSP में आनुपातिक वृद्धि नहीं की जा रही।
यह स्थिति नीति विफलता (Policy Failure) एवं राज्य के कल्याणकारी दायित्व के उल्लंघन को दर्शाती है।
1. MSP का निर्धारण वास्तविक उत्पादन लागत (C2 या कम से कम C1+FL) के आधार पर किया जाए।
2. निर्धारित उत्पादन लागत पर न्यूनतम 25% सुनिश्चित लाभ कानूनी रूप से जोड़ा जाए।
3. MSP को कानूनी अधिकार (Statutory Right) बनाया जाए, न कि केवल नीति-आधारित घोषणा।
4. MSP निर्धारण प्रक्रिया में किसान संगठनों की अनिवार्य भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
5. MSP के उल्लंघन पर दंडात्मक प्रावधान तय किए जाएँ।
संविधान के अनुच्छेद 32 एवं 226 के अंतर्गत माननीय सर्वोच्च न्यायालय / उच्च न्यायालय की शरण लेने,
एवं अन्य संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक उपाय अपनाने के लिए बाध्य होगी, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी संबंधित प्राधिकरण की होगी।