कृषि ट्यूबवेल हेतु विद्युत बिल माफी हेतु
माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर यह स्पष्ट किया गया है कि जीवन के अधिकार में गरिमापूर्ण जीवन एवं आजीविका का अधिकार भी सम्मिलित है। खेती के लिए सिंचाई अनिवार्य है और ट्यूबवेल हेतु बिजली जीवनोपयोगी आवश्यकता है। अतः कृषि ट्यूबवेल पर भारी बिजली बिल अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
राज्य का कर्तव्य है कि वह सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करे, उत्पादन के साधनों का न्यायसंगत वितरण करे। कृषि को कर या बिल के माध्यम से दंडित करना इन नीति-निर्देशक तत्वों के विपरीत है।
राज्य को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसान अपनी आजीविका बिना अत्यधिक वित्तीय बोझ के चला सके। बिजली बिल किसानों को कर्ज़, डिफॉल्ट और आत्महत्या की ओर धकेल रहा है।
माननीय न्यायालयों द्वारा यह सिद्धांत स्वीकार किया गया है कि खेती कोई व्यापार नहीं, बल्कि राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा से जुड़ा जीवन-कार्य है। अतः कृषि उपयोग हेतु बिजली पर वाणिज्यिक बिल लगाना असंवैधानिक एवं अनुचित है।
भारत के कई राज्यों (जैसे पंजाब, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि) में कृषि बिजली मुफ्त अथवा अत्यंत रियायती दी जा रही है। यह दर्शाता है कि यह मांग व्यावहारिक, वैधानिक और नीतिगत रूप से संभव है।
उपरोक्त तथ्यों, संवैधानिक प्रावधानों एवं न्यायिक सिद्धांतों के आधार पर, किशान मज़दूर एकता भारत सरकार से निम्नलिखित कानूनी मांग करती है:
सभी किसानों के ट्यूबवेल के बिजली बिल तत्काल प्रभाव से समाप्त किए जाएं।
तत्काल प्रभाव से सभी पुराने बकाया बिल माफ किए जाएं और वसूली प्रक्रिया समाप्त की जाए।
Essential Agricultural Service के रूप में मान्यता दी जाए और 24x7 बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।
सामाजिक कल्याण श्रेणी में रखा जाए और अत्यधिक रियायती दरें लागू की जाएं।
यदि उपरोक्त मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता है, तो किशान मज़दूर एकता संविधान के अनुच्छेद 32 एवं 226 के अंतर्गत माननीय न्यायालय की शरण लेने के लिए बाध्य होगी, जिसकी पूर्ण जिम्मेदारी संबंधित प्रशासन की होगी।
देश का किसान यदि सिंचाई के लिए भीख मांगेगा, तो राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। कृषि बिजली मुफ्त करना कोई अनुदान नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है।
पंजाब, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश में पहले से लागू
ट्यूबवेल - किसानों की जीवन रेखा
जीवन का अधिकार - गरिमापूर्ण जीवन
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