

देश में कृषि एवं भूमि से संबंधित विवाद — जैसे भूमि अधिग्रहण, बटाईदारी, मुआवज़ा, उत्तराधिकार, ऋण वसूली, फसल क्षति, कब्ज़ा विवाद आदि — वर्षों तक लंबित रहते हैं। इन मामलों की अनावश्यक देरी के कारण किसान आर्थिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से अत्यधिक पीड़ित होता है, जो कई बार आत्महत्या, विस्थापन और आजीविका के पूर्ण विनाश का कारण बनती है।
यह स्थिति निम्नलिखित संवैधानिक प्रावधानों एवं विधिक सिद्धांतों का प्रत्यक्ष उल्लंघन है—
(क) अनुच्छेद 21 – जीवन और गरिमा का अधिकार
माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया गया है कि “त्वरित न्याय (Speedy Justice)” अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है। कृषि/भूमि मामलों में वर्षों की देरी किसानों के जीवन, आजीविका और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है। (ख) अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार
अन्य वाणिज्यिक एवं विशेष मामलों के लिए विशेष न्यायालय उपलब्ध हैं, जबकि किसान-भूमि विवादों के लिए ऐसी व्यवस्था का अभाव असमान व्यवहार को दर्शाता है।
(ग) अनुच्छेद 39(b) एवं 39(c) – नीति निदेशक तत्व
राज्य का कर्तव्य है कि वह संसाधनों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करे और कमजोर वर्गों के शोषण को रोके। भूमि विवादों में देरी सीधे किसानों के शोषण को बढ़ावा देती है।
(घ) न्यायिक दृष्टांत (Judicial Precedents)
1. कृषि एवं भूमि मामलों के लिए कोई समर्पित, समयबद्ध न्यायिक तंत्र नहीं है।
2. सामान्य दीवानी न्यायालयों पर अत्यधिक भार होने के कारण किसान वर्षों तक मुकदमे झेलने को विवश है।
3. इस देरी से भूमि पर कब्ज़ा, अवैध बिक्री, कर्ज़ का बोझ और सामाजिक अन्याय बढ़ता है।
1. कृषि एवं भूमि विवादों के लिए पृथक “फास्ट ट्रैक कोर्ट” (Fast Track Courts) की स्थापना केंद्र एवं राज्य स्तर पर तत्काल की जाए।
2. ऐसे न्यायालयों में केवल कृषि/भूमि से संबंधित मामलों की ही सुनवाई हो।
3. प्रत्येक मामले में अधिकतम 60 दिनों के भीतर निर्णय अनिवार्य रूप से सुनिश्चित किया जाए।
4. किसानों के लिए सरल प्रक्रिया, न्यूनतम शुल्क एवं त्वरित सुनवाई का प्रावधान किया जाए।
5. आवश्यकता होने पर विशेष कानून / अधिसूचना / नियमावली जारी की जाए, जिससे यह व्यवस्था बाध्यकारी हो।
कृषि देश की रीढ़ है और किसान उसका आधार। यदि किसान को समय पर न्याय नहीं मिलेगा, तो यह न केवल संवैधानिक मूल्यों का हनन होगा, बल्कि सामाजिक असंतोष और आर्थिक अस्थिरता को भी जन्म देगा।