कृषि एवं भूमि संबंधी विवादों के त्वरित निपटारे हेतु फास्ट ट्रैक न्यायालयों की स्थापना एवं 60 दिनों के भीतर निर्णय सुनिश्चित करने के संबंध में विधिक माँग
माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया गया है कि "त्वरित न्याय (Speedy Justice)" अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है। कृषि/भूमि मामलों में वर्षों की देरी किसानों के जीवन, आजीविका और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है।
अन्य वाणिज्यिक एवं विशेष मामलों के लिए विशेष न्यायालय उपलब्ध हैं, जबकि किसान-भूमि विवादों के लिए ऐसी व्यवस्था का अभाव असमान व्यवहार को दर्शाता है।
राज्य का कर्तव्य है कि वह संसाधनों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करे और कमजोर वर्गों के शोषण को रोके। भूमि विवादों में देरी सीधे किसानों के शोषण को बढ़ावा देती है।
माननीय न्यायालयों ने यह माना है कि "Justice delayed is justice denied."
उपरोक्त तथ्यों एवं संवैधानिक अधिकारों के आधार पर, किशान मज़दूर एकता भारत सरकार से यह कानूनी मांग करती है:
कृषि एवं भूमि विवादों के लिए पृथक "फास्ट ट्रैक कोर्ट" (Fast Track Courts) की स्थापना केंद्र एवं राज्य स्तर पर तत्काल की जाए।
ऐसे न्यायालयों में केवल कृषि/भूमि से संबंधित मामलों की ही सुनवाई हो।
प्रत्येक मामले में अधिकतम 60 दिनों के भीतर निर्णय अनिवार्य रूप से सुनिश्चित किया जाए।
⚡ प्रत्येक मामले में अधिकतम 60 दिनों के भीतर निर्णय अनिवार्य
किसानों के लिए सरल प्रक्रिया, न्यूनतम शुल्क एवं त्वरित सुनवाई का प्रावधान किया जाए।
आवश्यकता होने पर विशेष कानून / अधिसूचना / नियमावली जारी की जाए, जिससे यह व्यवस्था बाध्यकारी हो।
कृषि देश की रीढ़ है और किसान उसका आधार। यदि किसान को समय पर न्याय नहीं मिलेगा, तो यह न केवल संवैधानिक मूल्यों का हनन होगा, बल्कि सामाजिक असंतोष और आर्थिक अस्थिरता को भी जन्म देगा।
यह माँग किसी प्रकार की रियायत नहीं, बल्कि संवैधानिक और विधिक अधिकार की पुनः स्थापना है।
भवदीय,
किशान मज़दूर एकता (Kishan Majdur Ekta)
(किसानों एवं मज़दूरों के अधिकारों हेतु समर्पित)
जय किसान • जय मज़दूर • जय हिंद
Speedy Justice - अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग
अधिकतम समय सीमा - निर्णय हेतु
कृषि एवं भूमि विवादों हेतु समर्पित
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